My Bicycle (Hindi poem)

Bicycle is the integral part of everyone's childhood. Many memories triggers when we remember our childhood's best friend. Here is the poem, on my bicycle, which symbolically reflects my (human's) laziness and fickleness.

अच्छा ही हुआ की मैं पतला नहीं हुआ।
अगर हो जाता, तो आज पतला होने के लिए,
मेरी साइकिल को क्यों याद करता?


हां वही साइकिल जिस पर बचपन में कई एडवेंचर्स (Adventures) किये,
एक्टिवा (Activa) आने के बाद, साइकिल ने हर एक ज़ुल्म सहे !!


कभी पानी और ऑक्सीजन (Oxygen) ने उस की शान पे रस्ट (Rust) का दाग लगाया,
तो कभी उसके, अब तक मेरा वज़न सहने वाले, टायर्स (Tyres) ने हवा का त्याग किया!


अच्छा ही हुआ की मैं पतला नहीं हुआ।
अगर हो जाता तो आज अपनी साइकिल को कैसे याद करता?


courtesy:pixabay


हां मेरे स्वार्थ ने आज मेरी कोने में पड़ी
ऑक्सीडाइज (Oxidize) होके रिड्यूस (Reduce) हो रही साइकिल को याद किया।


उस कोने में जहा लिज़र्ड्स (Lizards), स्पाइडर्स (Spiders) ने,
यहाँ तक छोटे छोटे प्लांट्स (plants) ने अपना बसेरा बनाया था। ..
आज मेरे स्वाार्थ ने कई घरो का भी बिध्वंस किया।


साइकिल को निकाल कर, उसकी जैसे आवाज़ सुनी मैंने,
मानो कह रही मुझसे "वाह! आज मेरी याद कैसे?"



साइकिल को देख के ही मैं तो चला गया उसी बचपन में
जहा स्कूल (School) और टयूशन्स (Tuition) में जाता था साइकिल पे।


जिस साइकिल ने मेरी शान थी बढ़ाई,
आज उसीकी कम हो रही थी शाइन (Shine)!!
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फिर क्या, बहुत ही धीरे से, आराम से मैंने उसको साफ़ किया,
ऑइल (Oil) देकर उसकी प्यास को शांत किया!!!


वो, इतने साल ज़ख़्मी खड़ी थी, एक पैडल (paddle) टुटा था,
और ब्रेक्स (Brakes) तो जाम ही हो गयी थी!


टायर्स पिचके हुए थे और चेन (Chain) निकली हुई,
साइकिल जैसे हस्ते हस्ते रोने लगी थी!


परं वो भी कम नहीं थी,
अपनी नाराज़गी उसने भी जताई!


जी हां! नाराज़गी जताने का उसका अपना ही तरीका था।
अपने स्टैंड (Stand) पर खड़ी न रहकर मुझ पर जैसे गिर पड़ी!


इम्बैलेंसड स्टेट (Imbalanced state) मैं आखिर खड़ी भी कैसे रहती?
मेरी साइकिल फाइनली (finally) हार मान गिर पड़ी!


मैकेनिक (Mechanic) के पास जाने के लिए निकाला जब मैंने उसे,
गेट (Gate) के बहार साइकिल की मुलाकात हुई बाइक (Bike) और एक्टिवा से!


बाइक और एक्टिवा जैसे चिढ़ा रहे थे मुझे और मेरी साइकिल को…
चहक और महक रहे थे बाइक और एक्टिवा, दोनों।


शांत और स्थिर खड़ी, मेरी साइकिल ने जैसे जवाब दिया,
हसलो हसलो क्योकि है आपको भी रोना।

"स्वार्थी है ये मानवी
जब तक हो काम के तब तक हो आप भाव के। 


काम गया.…
तो दाम भी जायेगा....


यही नियम है,
यही जीवन है!"

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दुःख, पछतावा और शर्म के मिश्रित फीलिंग्स(Feelings) ने मुझे घेर लिया,
अच्छा हुआ कबाड़ी को न देकर,साइकिल को अपने पास ही रखा।


अच्छा ही हुआ की मैं पतला नहीं हुआ
अगर पतला हो जाता तो मेरी साइकिल को कैसे याद करता?

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